सांस्कृतिक टकराव

सांस्कृतिक टकराव

1. प्रभु येशुआ सामरिया गए और वंहा चेलों को अन्यजातीय घरों में रहकर उनकी रोटी खिलाए और पानी पिलाएं। यह उनकी यहूदी संस्कृति के पूर्णतः विरूद्ध था। उन्होंने सामरियों पर यहूदी संस्कृति नही थोपा परन्तु उन्होंने अपने चेलों को सिखाया कि उन्हें स्थानीय संस्कृति के साथ घुलमिल जाना चाहिये। उन्होंने एक दुष्चरित स्त्री को भी ‘‘शान्ति (मेल) के पुरूश’’ के रूप में चुना। (यूहन्ना4अध्याय) 

2. बरनबास, अन्ताकिया की अन्यजातीय कलीसिया के लिये एक यहूदी मिषनरी था। उसने जाकर पौलूस को ले आया जो अन्यजातियों की संस्कृति को बहुत अच्छी तरह जानता था। कुछ यहूदी पंथ के लोग, उनके पीछे वंहा पहुंचे और उन पर  यहूदी संस्कृति लादनी चाही, जिसे यरूषलेम की महासभा ने स्वीकृत नहीं किया था। (प्रे.काम15ः20)

3. स्थानीय संस्कृति की विष्व दृष्टि को संदर्भ में रखकर ही कलीसियाओं की स्थापना की जाती है। यहूदी कलीसियांए, आने वाले मसीहा को संदर्भ में रखकर स्थापित की गई थीं जिससे रोतियों का कुछ लेना देना नहीं था क्योंकि वे तो कैसर के अपना प्रभु जानकर आराधना करते थे। भारतीय, गुरूओं में आस्था रखते हैं और उनकी सत्य की खोज को सन्तुष्ट करने के लिये, प्रभु येशुआ को उनके सामने ‘‘सतगुरू’’ के रूप में प्रेशित करना चाहिये।

4. अपने देश की जन जातियां जड़ात्मवादी/जीववादी हैं जो आत्माओं पर विश्वास करती हैं, जो उनके जीवनों पर प्रभाव डालती हैं। उनके लिये’’ विश्वास द्वारा अनुग्रह ही से उद्धार’’ बहुत कम मायने रखता है। नये नियम की सभी कलीसियांए और भारत और दूसरे देशों में अधिकांश नई उत्पन्न होने वाली कलीसियाओं की स्थापना, ‘‘सामर्थ के कामों को देखने’’ के बाद ही हुई है, जैसे की कोई अदभुत चंगाई या दुष्टआत्माओं से छुटकारा। उनके लिये प्रभु येशुआ को ‘‘सर्व सामर्थी’’ के रूप में प्रेशित करना चाहिये। (रोमियों15ः19;1कुरि.2ः1-5)

5. हिन्दू अपने ‘‘इष्ट देवता’’ या ‘‘स्वीकार्य प्रभु’’ की आराधना करते हैं, परन्तु यहूदियों की ही तरह वे ‘‘सर्वाेच्च परमेश्वर पर भी विश्वास करते है जिसे वे ‘‘महादेव’’ कहते हैं।

6. महान आदेश कहता है कि हमें सभी जातियों और सांस्कृतिक समुदायों के चेले बनाना है। प्रत्येक सांस्कृतिक समुदाय की अपनी अलग तरह का विवाह, कुटुम्ब नियन्त्रण और सामाजिक व्यवस्थाएं हैं। किसी समुदाय को दूसरे समुदाय पर अपनी संस्कृति थोपने का अधिकार नहीं है। समन्वयवाद, सुसमाचार का उल्लंघन करता है। पौलूस ने यहूदियों पर आरोप लगाया कि वे अन्यजातियों पर अपनी संस्कृति थोप रहे हैं, जैसे आधुनिक चर्च अपनी चर्च की संस्कृति को दूसरों पर थोपते हैं यह पश्चिमी संस्कृति को छोड़ और कुछ नही है। 

7. बहुत से लोग विशेषकर महिलांए और जवान सामाजिक/आर्थिक कारणो से बपतिस्मा नहीं ले पाते हैं ऐसे लोगं पर दबाव डालना गंभीर समस्यांए उत्पन्न करर सकता है। बपतिस्मा शब्दो को, किसी सांस्कृतिक तौर पर ग्रहणयोग्य शब्द में बदलने की आवष्यक्ता है, जैसेः ‘‘शुद्धिकरण का स्नान’’। पश्चिमी ‘‘चर्च संस्कृति’’ परिर्वतन के लिये मुख्य बाधा है जिसके परिणाम स्वरूप विश्व में लाखों सच्चे विश्वासी है जो बपतिस्मा रहित हैं। यह बपतिस्मा की कमी नहीं है परन्तु बपतिस्मा की अवमानना है जो दोशी ठहराती है। 

8. शब्द ‘‘ईसाई’’ जो कि एक अपमानजनक शब्द था उसे भी स्थानीय शब्द जैसे ‘‘यीशु भक्त’’ (यीशु के उपाशक) या ‘‘बलिराजा’’ (राजा जो बलिदान हुआ) के अनुगामी’’ या ‘‘सतगुरू मार्गी’’ (सत्य गुरू के अनुयाई)। उन्होंने स्वदशी आराधना के तरीके सिखाना चाहिये, इनमें वे पुल भी शामिल हैं जो उनके धर्म ग्रन्थों में हैं। प्रारम्भ में   मसीहियों को ‘‘मार्ग के लोग’’ कहा जाता था। (प्रे.काम9ः2;18ः25)

9. यहां तब कि ‘‘चर्च’’ शब्द का भी ऋणात्मक, पश्चिमी, औपनिवेषिक अर्थ लगाया जा सकता है। इसका भला व अच्छा स्थानिय शब्द जमात (सभा,मण्डली) और सत्संग (सत्य की सभा) हो सकते हैं। 

10. हम यहां वैश्विक दृष्टिकोण या नजरिये को नष्ट करने के लिये नहीं हैं परन्तु सुसमाचार को उनके विदमान संदर्भ में प्रस्तुत करने के लिये कह रहे हैं जैसा कि पौलूस ने किया था जब उसने अथेनवी बुद्धि जीवियों से कहा कि वह यहां उनके अनजान देवता के विशय में कहने आया है।

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