महिलाओं की भूमिका
- सुसमाचार प्रचारः प्रभु येशुआ ने अपने जी उठने के बाद सबसे पहिला काम यह किया कि उसने मरियम मगदलीनी को जो एक वेश्या के जीवन से सुधारी गई थी,कहाः ‘‘मेरे भाईयों से जाकर कहो’’। उसी समय से महिलांए पूरे विश्व में जा रही हैं और प्रभु येशुआ का सुसमाचार सुना रही हैं। (मत्ती 28ः10)
- बोलनाः पौलूस द्वारा कहे गए वचानों का अनुवाद इस प्रकार होना चाहिये, ‘‘मैं सार्वजनिक जगहों पर पत्नियों (GONE = पत्नी/स्त्री) को अपने पतियों (ANER = पति/पुरूष) पर हुकुम चलाने की अनुमति नहीं देता’’। उसने उन्हें कलीसिया में बोलने के लिये मना नही किया है। सन्देह दूर करने के लिये पौलूस ने पुरुषों पर भी प्रतिबन्ध लगाया। (1तीमु. 2ः11-12; इफि.5ः22-23; तीतुस 2ः3; 1कुरि.14ः31-32)
- शिक्षा देना : धर्मशास्त्र में प्रिस्किल्ला का नाम छः बार आया है, जिसमें तीन बान उसके पति अक्विला से भी पहिले आया है। उन्होंने अपुल्लोस को सिखाया था जो स्वंय बाईबल का बड़ा व्याख्याता था। (प्रे.काम18ः24-26; रोमियों 16ः1-2)
- शिष्य बनाना : प्रभु येशुआ ने महिला चेले नही चुने क्योंकि वे एक ही तरह के शिष्य बनाने का नमूना दिखा रहे थे। हम उनके नमूने के द्वारा कलीसिया में बहुत सी यौन बुराईयों से बच सकते हैं।
- बपतिस्मा देना कट्टर यहूदी रिवाज के अनुसार पुरूष भीगी हुई स्त्री को नहीं छू सकता था। इसलिये महिलांए एक दूसरे को अलग कुण्ड में बपतिस्मा दिया करती थी। याजक, किसी को भी चाहे पुरूष हो या स्त्री बपतिस्मा नहीं देते थे। यही बात मुस्लिमों /हिन्दुओं के संदर्भ में भी लागू हाती है।
- याजकत्व : सभी पुरूष और स्त्रीयां, परमेश्वर के स्वरूप में सिरजे गए हैं और परमेश्वर के सम्मुख समान हैं। उन्होंने दोनों को आदम (उत्पत्ती 5ः2; गल.3ः8) कहा है। और दोनो को मैम्ने के लोहू द्वारा, अपने राजपदधारी याजक बनाए हैं ताकि वे जाकर शिष्य बनांए , बपतिस्मा दें, और प्रभु भोज दें और आराधना करें।
- प्रेरितीयता : यूनिया (Junia) विख्यात महिला प्रेरित थी। (रोमियों 16ः7) 13 वी शताब्दी में स्त्री लिंग विरोधी अनुवादकों ने उसका नाम बदलकर यूनियास (Junias) कर दिया। प्रेरितों को परमेश्वर द्वारा अभिषेक दिया जाता था (लूका 11ः49; 1कुरि.12ः28; इफि.4ः11), ताकि वे आश्चर्य कर्म करने वाले हो (2कुरि. 12ः12; प्रे.काम2ः43), वे गवाह जिन्होंने प्रभु येशुआ के पुनरूत्थान की घोषणा की (प्रे.काम 4ः33) जो कलीसियाओं के स्थापक और अगुवे थे (प्रे.काम 4ः36;15ः4; 1कुरि.12ः28), सुसमाचार प्रचार (1तीमु.2ः6; 2तीमु.1ः11), शिक्षक (2पतरस 3ः2; यहूदा 17; प्रे.काम 2ः42), शिष्य बनाने वाले (इफि.4ः12-13), बपतिस्मा देना और पवित्र आत्मा प्रदान करना (प्रे.काम 19ः1-6) जबकि प्रेरित, इन सब सेवकाईयों में नही लगे रहते थे परन्तु यह विश्वास करने के लिये कोई कारण नहीं है कि विख्यात प्रेरित जैसे यूनिया; प्रिस्किल्ला, फीबे, लुदिया, नुम्फास और बहुत सी दूसरी महिलाओं पर इन सेवकाईयों के लिये रोक थी।
- सांस्कृतिक सांकेतिक चिन्हः कुरिन्थ के मन्दिर की वेश्याएँ अपने सिरों को मुण्डाती थी। पौलूस ने महिलाओं को अपने सिरों को कपड़े ढांकने के लिये नही कहा, परन्तु प्राकृतिक बालों से ढांकने के लिये कहा। पौलूस जो खुद पुरूष था, अपने सिर को पूरे समय यहूदी टोपी, जिसे किपा कहते हैं, से ढंककर रखता था। उसने उन्हें यह भी कहा कि भड़काऊ वस्त्र, तरह तरह के बाल गूंथना और दिखावे वाले सोने के जोवरों का उपयोग न करें परन्तु उन्हें साधारण जेवरों और शालीन वस्त्र पहिनने से कभी रोका नही गया। (1कुरि.11ः5,6,15,16)
- चरवाहीः नये नियम की सभी कलीसियाओं की स्थापना घरों में होती थी, जिनकी प्रायोजक महिलांए ही होती थी। जैसे मरकुस की माता मरियम (प्रे.काम 12ः5,12), लुदिया (प्रे.काम 16ः14,15,40) अपफिया (फिलेमोन1ः2), नुम्फास् (कुलु.4ः15); प्रिस्किल्ला (1कुरि.16ः19) रोमियों के सोलहवें अध्याय में नौ महिलाओं के नाम हैं जो कलीसियाओं में अगुवाई करती थी।
- वरदानों का देनाः दो तिहाई विश्व की 80% नई बनने वाली कलीसियाओं की स्थापना महिलाओं द्वारा हुई है। कलीसियाई सेवकाई वरदान आधारित है और लिंग आधारित नहीं। लिंग का भेदभाव करने वालों के लिये कोई स्थान नहीं होना चाहिये, यदि पूरी कलीसिया, पूरे सुसमाचार को पूरी दुनिया में ले जानें के लिये गंभीर है।

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