डिजिटल (आंकिक) कलीसिया

जिसमें मीडिया / पत्रकारिता एक मंच की तरह है ।

  1. सन् 2020 तक पृथ्वी पर 8.5 अरब लोग निवास कर रहे होंगे। अब इसमें काम करने के तरीकों में बदलाव करना आवश्यक है, यहां तक कि अब सुसमाचार प्रचार के परम्परागत तरीके पीछे छूट गए हैं, और अब कलीसिया रोपण आन्दोलनों को प्रज्वलित करने के मंच के रूप में उपयोग होने के लिये चौंका देने वाली संभावनांए पैदा हो गई हैं। इसके अन्तर्गत व्यक्तिगत गवाहियों से लेकर छोटे समूहों में प्रश्नौत्तर भी हो सकेंगे। ‘‘यीशु ने प्रचार..... करना आरम्भ किया...स्वर्ग का राज्य निकट आया है।’’ (मत्ती4ः17)

  2. फिल्म, रोडियो, टेलिविजन, इन्टरनेट, सैलफोन, आई पॅाड और आई पॅाड्स इत्यादि आज सुसमाचार प्रचार एंव शिष्य बनाने के लिए अधिकाई के साथ काम में लाए जा रहे हैं, ‘‘प्रभु का आत्मा मुझ (प्रभु येशुआ) पर है, इसलिये कि उसने कंगालों को सुसमाचार सुनाने के लिये मेरा  अभिषेक किया है और मुझे इसलिये भेजा है कि बन्धुओं को छुटकारे का और अन्धों को दृष्टि पाने का सुसमाचार प्रचार करूं और कुचले हुओं को छुड़ाऊं।’’ (लूका4ः18)
  3. सैल फोन की तकनीक - आज प्रतिदिन लगभग बीस लाख लोग इन्टरनेट में सत्य, प्रेम और परमेश्वर की खोज के लिये देखते हैं। भारत में सैलफोनों की संख्या,1600लाख है जो यहां के 
  4. शौचालयों से भी अधिक है। सुसमाचारीय संदेश, शैतान के दृढ़ गढ़ों को तोड़कर ढा रहे हैं। प्रभु ‘‘येशुआ, शैतान के कार्यो को नाश करने के लिये आए’’। (1यूहन्ना3ः8)

  5. तकनीकी कम्पनियां अब 16 भू समकालिक (Geosynchronous) उपग्रह छोड़ने की तैयारी कर रही हैं, जो ‘‘औथ्रीबी’’ (O3B योजना कहलाती है जिसका अर्थ है, दूसरे तीन अरब (other 3 Billion) लोग जो अब तक इन्टरनेट से नहीं जुडे़ हैं। सन 2015 तक, पृथ्वी पर कोई ऐसा क्षेत्र नही बचेगा जो इन्टरनेट सेवा के अर्न्तगत नहीं आ जाएगा ‘‘प्रभु येशुआ खोए हुओं को ढूढ़ने और उनका उद्धार करने आए’’ वे प्रत्येक में जाकर लोगों को खोज रहे हैं। (मरकुस1ः38;लूका4ः43;19ः10)

  6. इन्टरनेट की ‘‘ग्लोबल मीडिया आऊटरीच’’ प्रतिमाह एक अरब लोंगो को देखती अर्थात उसने सम्पर्क साघती है, तो दर्शाता है, मसीह को ग्रहण करने का निर्णय। लगभग 400000 लोग उनके एक वेबसाईट पर आते हैं। उनमें से लगभग 15 प्रतीशत अपने सम्पर्क की जानकारियां छोड़ जाते हैं, जिनसे बाद में उनके 5000 ई. मिशनरियों द्वारा wwww.greatcommissin2020.com पर सम्पर्क करके सुसमाचार दिया जा सकता है। प्रभु येशुआ सबों के लिये अपना प्राण देने आए .... वह अपने खोजने वालों को प्रतिफल देता है।’’ (यूहन्ना10ः10;इब्रानियों11ः6) 
  7. अभी वर्तमान में अनगिनत ई. शिष्य बनाने वाले हैं, फिर भी अभी कई लाखों की और आवश्यकता है, यहां तक कि युवकों और  घर में रहने वाली पत्नियों को भी जो घर में के आराम और सुरक्षा में रहते हुए इस काम को कर सकती है, और वे पूरी तरह अनजान लोगों से सम्पर्क साधकर आत्माओं को बचा सकते, शिष्य बना सकते हैं और इस प्रकार पृथ्वी की छोर तक डिजिटल कलीसियाओं की स्थापना कर सकते हैं। ‘‘जो आंख ने नही देखी और कान ने नहीं सुना, और जो बातें मनुष्य के चित में नहीं चढ़ीं, वे ही हैं जो परमेश्वर ने अपने प्रेम रखने वालों के लिये तैयार की हैं।’’ (1कुरिन्थियों2ः9)
  8. यहं तक कि उन देशों में भी जो पत्रकारिता (मिडिया) से बहुत लगाव रखने वाले हैं, लोग छपी हुई पुस्तकों से दूर जा रहे हैं और टी.वी. और इन्टरनेट पर अपनी शिक्षा के लिये निर्भर हो रहे हैं जिसे ‘‘दूसरी मौखिकता’’ (2nd oratity) कहते है। यह पंहुचरहित लोगों से सम्पर्क करने की बिलकुल अलग प्रकार की रणनीति है जिससे हम उन तक सुसमाचार पंहुचा सकते हैं, ‘‘क्योंकि वे ऐसी बात देखेंगे जिसका वर्णन उनके सुनने में भी नहीं आया, और ऐसी बात उनकी समझ में आएगी जो उन्होंने अभी तक सुनी भी न थी।’’ (यशायाह52ः15)
  9. इन्टरनेट, विनाष के लिये एक ब्राडबैंड हो सकता था और उद्धार प्राप्ति के लिये एक सकरा फाटक भी हो सकता है। यह हम पर निर्भर करता है कि हम इनमें से किसी से भी इन्टरनेट की खिड़की पर मुलाकात करें। सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि उन्हें केवल सुनने वालों नहीं पर वचन को कार्यरूप में परिणित करने वाले बनांए और ‘‘उनके नामों को जीवन की पुस्तक में लिखवा दें।’’ (मत्ती7ः13-14;लूका10ः20; याकूब1ः20)


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