उन्हें आज्ञा मानना सिखाओ

 उन्हें आज्ञा मानना सिखाओ
  1. प्रभु येशुआ ने बहुत सी आज्ञांए दी हैं परन्तु एक सुस्पष्ट आज्ञा यह है कि, ‘‘उन्हें  सब बांते जो मैंने आज्ञा दी हैं, मानना सिखाओ’’। (मत्ती 28ः19)
  2. आपका प्रेम प्रभु येशुआ के प्रति शर्त के साथ है, ‘‘यदि तुम मुझसे प्रेम रखते हो तो मरी आज्ञाओं को मानोगे’’। (यूहन्ना 14ः15, 21, 23)
  3. अनाज्ञा कारिता के कारण आदि पिता आदम ने अदन के बाग को खो दिया और योना भविष्यवक्ता को मछली के पेट में रहना पड़ा। (उत्पत्ती 3ः23-24; योना 1ः17)
  4. शाऊल को आज्ञा नही मानने के कारण अपना राज खोना पड़ा,‘‘देख बलवा करना .... तूने यहोवा की बात को तुच्छ जाना, इसलिये उसने तुझे राजा होने के लिये तुच्छ जाना है’’। (1शमूएल 15ः22-24)
  5. इब्राहीम को आशीषें दी गईं क्योंकि उसने परमेश्वर के वचन को माना, ‘‘इस कारण मै तुझे निश्चय आशीष दूंगा और तेरे वंश को......अनगिनित कंरूगा .......और  तेरा वंश अपने शत्रुओं के नगरों का अधिकारी होगा’’।(उत्पत्ती 22ः17,18;व्य.वि.7ः12-15)
  6. परमेश्वर ने इस्राएल से प्रतिज्ञा की,‘‘इसलिये अब यदि तुम निश्चय मेरी मानोगे और मेरी वाचा का पालन करोगे, तो सब लोगों में से तुम ही मेरा निज धन ठहरोगे..और तुम मेरी द्रष्टि में याजकों का राज्य और पवित्र जाति ठहरोगे’’। (निर्गमन19ः5,6)
  7. शिक्षा देना, सूचना पहुंचाना और मर्म प्रकट करना है। प्रशिक्षक, हुनर प्रदान करता है। यह (अ) उन्हें बतांए कि ऐसा क्यों है (ब) उन्हें दिखांए कि उसे कैसे करना है (स) उन्हें काम आरम्भ करा दें (ड) उन्हें काम करते रहने दें (इ) कुछ समय बाद पुनः जाकर देखें कि काम कैसे चल रहा है (ई) अब उन्हें तैयार करें कि वे दुसरों को भी इसे सिखा दें। (प्रे.काम14ः21-23;फिलिप्पियों4ः9)
  8. अगुवों को बहुत से काम करने होते हैं लेकिन प्रशिक्षकों को हुनर सिखाने पर ध्यान केन्द्रित करना होता है। बिना अच्छे प्रशिक्षक (कोच) के कोई भी टीम मैच नही जीत सकती। उन्हें केवल सुनने वाले बनाना व्यर्थ साबित होगा परन्तु वचन को सुनकर उसे करने वाला बनाना है तो बहुत अभ्यास की जरूरत होगी।
  9. कमजोर देखभाल, सदर्भ रहित उपदेश, टी.वी पर बाईबल की एतिहासिक कहानियां , और इसके अलावा सन्डे स्कूल में गीत और गहानियां भी सिखाएं जाते हैं, परन्तु उन्हें चेले बनाने के गुर व हुनर नहीं सिखाए जाते 198 प्रतिशत मसीही, धार्मिक विकलांक है जो अपने घनिष्ट मित्र को भी गवाही नही दे पाते। 
  10. विश्वास में परिपक्वता यहा नही है कि आप कितना जानते हैं, परन्तु यह विरोधियों को कायल करने, समझने और उन्हें परिवर्तित कर देने की योग्यता है। ‘‘कि (वह) खरी शिक्षा से उपदेश दे सके, और विवादियों का मुंह भी बंद कर सके’’। (तीतुस 1ः9)
  11. प्रेरितीय शिक्षा का सार, मिल जुलकर कार्य करने का तरीका और रणनीतिक चुनाव, सन्तों को आत्मिक सुसज्जा प्रदान करता है। ‘‘ अन्य जातियों को वचन अैर  कर्म में आज्ञाकारी बनाने के लिये। (रोमियों 15ः18)
  12. तीन प्रमुख बातेंः शिक्षा देने के तुरन्त बाद कुछ सम्बन्धित प्रश्न पूछना चाहिये कि जो शिक्षा दी गई उसका मर्म या सार क्या है? उस आज्ञा को कैसे पूरा करेंगें? उसे दूसरों को कैसे बातांएगे व समझाएंगे? पुनः जाकर अवलोकन करें कि सारे काम ठीक रीति से क्रियान्वित हो रहे है या नहीं।
  13. सिखांए, प्रशिक्षण दें, हुनर सिखाएं और सब कुछ समझांए फिर जितने अधिक लोगों को जमा कर सकते हों, उनके बीच दी गई शिक्षा पर वार्तालाप और विचार विमर्श करने दें। इसके बाद उनमें से क्रियाशील अर्थात काम करने वालों को चुन लें और उनका दर्जा बढ़ाएं। ऐसा बार बार यथा संभव करें। जब तक वे दूसरों को भी प्रशिक्षित करना न सीख लें। चार प्रकार की जमीन होती है, केवल अच्छी जमीन ही 25प्रतिशत फलवंत होगी।
  14. कुछ ‘‘अ’’ वर्ग के रास्ट्रीय (कोच) प्रशिक्षिक हैं जो मसीही अगुवों को प्रशिक्षण देते हैं। कुछ ‘‘ब’’ वर्ग के क्षेत्रिय संत है जो तृण मूल किस्म के सेवकों को तैयार करते है। परन्तु ‘‘स’’ वर्ग के प्रशिक्षक हैं जिन्हें तिरिस्कृत नही किया जा सकता क्योंकि वे परमेश्वर के राज्य को फैलाने जाते और उसके लिये सताव भी सहते हैं। अन्त् की बात यह है कि पवित्र आत्मा ही हमारे यथार्थ शिक्षक हैं। ‘‘वह तुम्हें सब बातें सिखाएगा’’। (यूहन्ना 14ः26; 16ः13; प्रे.काम 1ः8)
  15. आज छोटे छोटे झुण्डों में पवित्र आत्मा की आज्ञा कारिता में दिये गए प्रशिक्षण द्वारा निपुण, आत्म विश्वासी और बची हुई आत्माओं के उत्पादन को बढ़ाने वाले ‘‘मनुष्यों के मछुवारे’’ तैयार हो रहे हैं, जो ‘‘जगत को उलट पुलट कर रहे हैं।

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