गृह (घरेलू) कलीसिया का इतिहास

 गृह (घरेलू) कलीसिया का इतिहास

1. प्रथम 300 वर्षों तक कलीसिया गुप्त रूप से अपने आपसी प्रेम की घनिष्टता के साथ विश्सिवायों के घरों में मिला करती थीं। उस समय उनके पास कोई गिरजाघर, पास्टर ,रविवाररीय आराधना, क्रूसेड, बाईबल प्रशिक्षणकेन्द्र और दशमांश जैसी बातें नही थीं। इन अवरोधों के न होने से कलीसिया विश्वाश में दृढ़ और संख्या में प्रतिदिन बढ़ती जाती थी। (प्रेरितों के काम 16ः5

2. पौलुस घर घर जाकर,परमेश्वर के सम्पूर्ण ज्ञान की बातों को बताता था। सारा प्रशिक्षण कलीसिया आधारित था। 380 ईशवी में घरेलू कलीसिया पर कानूनी प्रतिबंध लगा दिया गया। कलीसिया के प्राण जोखिम में आ गए और वह हजार वर्ष के अंधकारमय युग में चली गई। (प्रेरितों के काम 20ः20;27-29)

3. निकुलई लोग, साधारण सदस्यों (लेमेन) को जीत लेने या अपनी ओर कर लेने पर विश्वास करते हैं। वे अपने को उंचे दर्जे का दावा करके और कलीसिया को बोलने वाले और सुनने वालों में विभाजित करके, कलीसिया के साधारण लोगों (लेमेन) को अपनी ओर कर लेते थे। येशुआ इस विभाजन से घृणा करते हैं और इसे प्रथम प्रेम को खोने, मूर्तिपूजा और अनैतिकता के बराबर कहते हैं। फिर भी वर्तमान कलीसिया इस घृणित विभाजन में पूरी तरह लिप्त है। (प्रे.का.6ः5;प्रका.वा.2ः4,6;14-15,मत्ती 12ः25)

4. कलीसिया रोमी राजाओं के द्वारा कठोरता के साथ प्रताड़ित की गई। कांस्टन्टाईन ने सोलार क्रूस का दर्शन पाया, और युद्ध करके रोम का सम्राट बन गया। उसने अपने आपको ‘‘डिफेक्टो पोप’’ नियुक्त कर लिया और पहिला केथेड्रल बनाकर उसमें तनख्वाह धारी पुरोहित ठहरा दिया और केथोलिक आराधना का आरम्भ कर दिया (312 से 325 ई. बाद)। 

5. रोमी साम्राज्य ने उन दिनों में नामधारी मसीहियों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी, वहां विधर्मी पुरोहितों को उनके विधि विधान के साथ संस्कारित किया गया, ये सब उनमें अब तब विद्यमान हैं, जैसेः चोगे, पुलपिट, उपदेश, संस्कार, वेदी और संगति। पंरपरावादी कलीसियाओं में विधर्मी वस्तुकला (Gothic) तथा उसके पुरोहितों और अधिकारियों का प्रशासन, रोमी शासन व्यवस्था पर आधारित हैं जबकि इनकी आराधना विधि, बाबुल की पूजा-पद्धति पर आधारित है। इसीलिये ये संगठनात्मक चर्च अन्दर की तरफ धसक रहे हैं बनिस्बत इसके कि बाहर की ओर संसार मे फूट पड़ें।

6. 321ई.बाद, कांस्टन्टाईन ने मृत्यू दण्ड की सजा के बाद यह राजाज्ञा दी कि अपंराजित सूर्य (Sol Invictus) के लिये रविवार की श्रद्धा भक्ति की जाए। केथेड्रल की उंची मीनारों पर सूर्य की प्रथम किरणों के साथ घण्टियां बजाकर उत्सव आरम्भ होता था। रोम का विशप पोंटिफेक्स मेक्जीमस (पोप = पापा) अर्थात ‘‘परमेश्वर और मनुश्यों के बीच पुल’’ बन गया। 

7. नये नियम की कलीसिया की अगुवाई पवित्र आत्मा द्वारा होती थी, जो उन्हें भजन, प्रकटीकरण, शिक्षा और भविष्यवाणी द्वारा प्रेरित करते थे। पोप ग्रेगरी (500ई.) ने आराधना को ‘‘विधिवत क्रमश: की जाने वाली आराधना’’ में बदलकर, पूरी तरह बिगाड़ डाला जिसमें क्रमश: भजन, धर्मशास्त्र, उपदेश और संस्कार इत्यादि होते हैं जैसा अभी भी आधुनिक चर्चो में प्रचिलित है। इसके द्वारा विश्वासियों की सहभागीता होकर आराधना करने की आत्मा की हत्या हो गई। (1कुरि.14ः26

8. पोप लियो (440ई.) ने पुरोंहितों को जीवन पर्यन्त अविवाहित रहने की घोषणा करदी जिससे बाईबल अनुसार एक पत्नी वाले प्राचिनों की सेवाएं समाप्त हो गईं। 416ई. में बच्चों का छिड़काव का बपतिस्मा अनिवार्य कर दिया गया। क्रूसेडरों (सन्1096ई.) ने यहूदियों और मुस्लिमों का कत्लेआम किया। 600 वर्षों के क्लेश भरे कठिन अंतराल में लाखों लख विश्वासियों को विधर्मी घोषित किया गया, शारीरिक पीड़ाएं दी गई यहां तक कि मृत्यू होने तक सताया गया। इन्हीं समयों में धर्म के ठेकेदारों ने धर्मशास्त्रों में बहुत सारी शरारत कर डाली। 

9. सन्1517 में मार्टिन लूथर ने धर्म संषोधन करके 95 सिद्धान्तों को केथौलिक चर्च के विरूद्ध प्रस्तुत किया। सन्1526 में घरेलु कलीसिया को सहमति देने के तुरन्त बाद सन्1530ई.में वह वचन से पलट गया और घरेलु कलीसिया के अगुवों पर मृत्यू दण्ड की आज्ञा घोषित करा दिया। 

10.सच्ची कलीसिया इन सारी विपदाओं के मध्य सदियों तक जीवित रही, ढांचागत चर्चो में नहीं परन्तु धर्म शहीदों के घरों में। लूथर का संशोधन केवल एक धार्मिक विश्वास था कि ,‘‘अनुग्रह द्वारा विश्वास से ही उद्धार है’’। परमेश्वर अब पुनः अपनी कलीसिया को वैश्विक कटनी के लिये,नई मशकों अर्थात घरेलु कलीसियाओं के रूप में, बना रहे हैं, जो साधारण और कार्यशील कलीसियाएं हैं।


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